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अनकही

Posted by Deepak in , ,


मेरी खामोशियों को तुम पहचान क्यों नहीं पाए,
इक उम्र गुज़र गयी तुम मुझे जान क्यों नहीं पाए।

इज़हार-ए-मोहब्बत का सलीका मुझे नहीं आता,
ख़ामोश लबों की गुज़ारिश तू समझ क्यों नहीं पाता।